Thursday, April 28, 2011

तलाक: जिम्मेदार कौन?


पिछले दिनों अपने एक दोस्त की धर्मपत्नी से इन्टरनेट पर मुलाक़ात हुई जिसकी शादी मैंने और मेरे ही दोस्तों ने मिलकर आर्य समाज मंदिर में करवाई थी.बड़े आदर के साथ जब मैंने उन्हें नमस्कार कर पुछा की भाभी आप कैसी हैं तो अचानक उनकी जो उग्र प्रतिक्रिया थी वो मेरे समझ से परे थी..उनके शब्दों के बाण मुझे ऐसे लग रहे थे जैसे मैंने भाभी कह कर उनका अपमान कर दिया हो..मैं कमाती हूँ और किसी भी तरह की पाबन्दी सहन करना न मेरी मजबूरी है न ही आदत..आखिर कोई और मेरे जीवन पर नियंत्रण कैसे रख सकता है? मैं केवल घर बैठ कर बच्चे नहीं पैदा कर सकती.. इसलिए मैंने तलाक ले लिया है ताकि अपने ढंग से जीवन जी सकूँ..कितनी विडंबना वाली बात है की रीतू ने अपने पति को कोई का दर्जा दे दिया..और उसे ही अलगाव का जिम्मेदार भी मान लिया.... पहले पति-पत्नी शादी को जन्म जन्मांतर का रिश्ता मानते थे.एक दूसरे से अलग होने की बात वो सोच भी नहीं सकते थे..बदलती जीवन शैली और औरत की बढती महत्वकांक्षाओं के चलते जिंदगी में जटिलता आ गई है.. नतीजन भौतिकवादी संस्कृति के तहत यह रिश्ता अपनी अहमियत खोता जा रहा है और अदालतों में सम्बन्ध तोड़ने के मामले बढते जा रहे हैं..औरत अपनी सामाजिक मान्यताओं को नज़रअंदाज़ कर रही है.केवल पति ही शादी-शुदा जिंदगी में आने वाली कटुता, अलगाव या तलाक का जिम्मेदार होता है ये कहना आज के संदर्भ में सही नहीं बैठता..औरत न तो अब अबला रही है न असहाय या पति पर निर्भर..इसलिए तलाक के लिए पत्नी भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना की पति..आज के आकड़ों पर नज़र डालें तो नज़र आएगा की आज पुरषों की अपेक्षा महिलाएं तलाक के लिए ज्यादा पहल करती है...और इनमें अधिकतर वो महिलाएं हैं जो युवा,आर्थिकरूप से आत्मनिर्भर या आज़ादी पसंद हैं..ये औरतें परंपरा या परिवार के नियम कायदों को मानने के बजाय खुद की संतुष्टि और खुशी को ज्तादा महत्त्व देती हैं..अहम ने औरत के अंदर जन्म ले लिया है मैं कमाती हूँ ? मैं सक्षम हूँ तो घर का काम क्यूँ करूँ ? मैं भी थकी हारी ऑफिस से आती हूँ तो पति की चाय क्यूँ बनाऊं? आदि ऐसे कई सवाल हैं जो आज की कामकाजी महिला की ज़बान हरदम रहते हैं...आज का युगल तलाक को एक समाधान की तरह देखने लगा है.. अधिकतर मामलों में अब पहल औरत की तरफ से होने लगी है..बेहतर शिक्षा,अच्छा वेतन और कार्यक्षेत्र में अर्जित सम्मान ने औरत को पुरानी स्थितियों को नए परिप्रेक्ष्य में देखने को प्रेरित कर दिया है..यही वजह है की उसमें जहाँ सहनशीलता की कमी आयी है वहीँ वह किसी तरह का समझोता करने को भी तैयार नहीं है..आर्थिक स्वतंत्रा ने औरत को एक तरह से बागी और अहंकारी बना दिया है.. जिसकी वजह से रिश्ते अगर उसकी राह में आते हैं तो रिश्तों से खिलवाड़ करने में उसे देर नहीं लगती..औरत जिम्मेदार इसलिए भी है क्यूंकि बदलाव उसमे आया है, औरत में आई सहनशीलता की कमी परिवारों को ताड़ने में सबसे बड़ी वजह बन गयी है, वो तो स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बन गयी है, पुरुष तो अभी भी अपनी पुरानी मानसिकता के दायरे से बहार नहीं निकल सका है जिसकी वजह से मतभेद बढ़ रहे हैं...और इसके लिए पति ही जिम्मेदार है ये कहना कहाँ तक न्यायसंगत है?..देर से शादी करना और अपने करियर को प्राथमिकता देना, अपने जीवन से जुड़े फेसले खुद लेना,इन्टरनेट और पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव जैसी हर चीज़ ने औरत की शादीशुदा जिंदगी से जुडी अपेक्षाओं को बड़ा दिया है.. आर्थिक सुरक्षा से उपजे आत्मविश्वास में अहम इस हद तक शामिल हो गया है की औरतें शादीशुदा जिंदगी की मुश्किलों को सुलझाने की बजाये तलाक का रास्ता अपना रहीं हैं.तलाकशुदा औरत को लोग किस नज़र से देखेंगे, इस की भी उसे परवाह नहीं है, क्यूंकि उसे तो अपनी आज़ादी से प्यार है और इसलिए वो शादी जैसे अटूट रिश्ते को भी तोड़ने में पलभर तक नहीं लगाती..एक समय था जब शादी करना ही औरत की प्राथमिकता और सोशल स्टेटस होता था, पर आज स्थति बिलकुल विपरीत है ...पति अगर उसकी नहीं सुनता या उसके हिसाब से नहीं चलता तो वह उस से तलाक लेने की बात करते हुए न तो समाज को परवाह करती है न परिवार के सम्मान की ....

Monday, April 11, 2011

अपराधबोध मोदी.......


कोई व्यक्ति कितना ही बड़ा अपराधी क्यूँ न हो लेकिन इश्वर जब उसे सदबुध्धि देता है तो उसे अपने किये पर पछतावा ज़रूर होता है ये बात अलग है की ये बात सभी अपराधियों पर सटीक न बैठती हो, लेकिन हाल के दिनों में हुई कुछ घटनाओं ने ये सोचने पर मुझे विवश कर दिया ... की शायद ऐसा होता है....देश के विभिन्न शहरों में बम विस्फोटों के आरोपी स्वामी असीमानंद को उनके द्वारा किये गए अपराध की सजा एक निर्दोष को मिलते देख पश्यताप का मन हुआ और वो भावुक हो गए....अपना गुनाह कुबूल कर लिया...इसी तरह अपनी हटधर्मिता और बदनाम छवि वाले ..गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को जब ये पता चला की भारत की करोड़ों दिलों में समाये ..अपनी स्वच्छ छवि वाले सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने उनकी तारीफ की है तो उन्हे खुशी तो बहुत हुई साथ ही ये दुःख भी हुआ की ...जो अपराध नरेन्द्र मोदी ने किया है उसकी सजा अन्ना हजारे को क्यूँ मिले...इसलिए उन्होंने अन्ना हजारे को अपनी तरीफ़ के लिए शुक्रिया के साथ ये भी कहा की मुझे बड़ा अफ़सोस है की आप की छवि मेरे कारण कहीं खराब न हो जाये.... मोदी साहब इसके पीछे आपकी क्या राजनितिक सोच है ये तो आप से बेहतर शायद ही कोई जान सकता है लेकिन हम आम भारतवासियों को इस बात की खुशी है की आपने अपने गुनाह और अपराधी छवि में एक निर्दोष को उसकी छवि को धूमिल होने से बचा लिया...

हमारे विश्वास का गला मत घोटो...


लाखों भारतवासियों के दिलों में पलभर में समां जाने वाले अन्ना हजारे को क्या हो गया...एक स्वच्छ छवि वाले सामाजिक कार्यकर्ता को क्या हो गया,हो सकता है उम्र का तकाज़ा हो क्यूंकि अभी तो मौसम की गर्मी भी इतनी नहीं है की व्यक्ति कहना कुछ चाहे और गर्मी से ज़बान लडखडा जाये,जिस अन्ना हजारे की तुलना हम देशवासी राष्ट्रपिता गाँधीजी से कर रहे थे उन्हें अचानक क्या हो गया की वो अपनी महान छवि को भूल नरेन्द्र मोदी का गुणगान करने लगे..पुरे भारतवर्ष में अन्ना हजारे को सिर्फ दो ही ऐसे मुख्यमंत्री दिखे जिनके राज्य में विकास हुआ है,अरे अन्ना जी जिस लोकपाल बिल के लिए आज पूरा देश आपके साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ कंधा से कंधा मिला रहा है क्या उस जनता को ये बताने का कष्ट करेंगे की क्या गुजरात में लोकायुक्त नाम की कोई संस्था भी है...फिर आपका ये कहना की देश को नरेंद्र मोदी और नितीश कुमार जैसे लोगों की ज़रूरत है..हमे तो आपके अनशन को देख कर लगा था देश को आप जैसे लोगों की ज़रूरत है,भला एक सामाजिक कार्यकर्त्ता का किसी पार्टी की तरफ झुकाओ उन लाखों भारतवासियों के मन मष्तिष्क को दोराहे पर लाकर खड़ा कर देता की कहीं ये कोई राजनितिक षड्यंत्र तो नहीं , जो अब तक आप पर विश्वास करते आये हैं.. इस मनु स्थति के कई करण हैं जैसे माओवादियों के कैंप में जाकर देशद्रोही भाषण देने वाले स्वामी अग्निवेश का मंच पर आकर आपका साथ देना , (जिसका नतीजा हमारे जवानों का क़त्ल..) , अपनी बेटी को फर्ज़ी तरीके से मिजोरम कोटा के तहत दिल्ली के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन दिलवाने वाली पुलिस अधिकारी किरण बेदी ... (जहाँ हम आम हिंदुस्तानी के बच्चे एडमिशन के लिए लाइने लगाते हैं....), प्रियंवदा बिड़ला की संपत्ति को अपना बता कर हड़पने की साजि़श रचने वाले आर एस लोढ़ा जैसे बेइमान का वकील शांति भूषण .. देश की आन, बान और शान संसद, पर हमले में गाहे बगाहे शामिल शौकत हुसैन गुरु के लिए सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने वाला शांति भूषण .....अन्ना हम ने तो समझा था हम भारतवासियों को दूसरा राष्ट्रपिता मिल गया.हमने तो आपको गांधीजी का समकक्ष समझा है ..एक महान छवि वाला सच्चा सामजिक कार्यकर्ता समझा है ...अन्ना जी एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर सकती है लेकिन एक साफ़ और स्वच्छ छवि वाली मछली सारे तालाब को पवित्र नहीं कर सकती...हम भारतवासियों ने आप की छवि पर विश्वास किया है..आप पर विश्वास किया है....

Sunday, April 10, 2011

अन्ना हज़ार हैं......


मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल की ओर लोग आते गए और कारवां बनता गया..अगर कोई इंसान कुछ करने की सोच ले तो कोई भी काम मुश्किल नहीं होता, और जिस काम का मकसद साफ़ हो,नियत में कोई खोट न हो तो वहाँ तो इश्वर भी खुद साथ देता है,अन्ना हजारे ने सरकार के खिलाफ लोकपाल बिल को लेकर अनशन करने की जो पहल की वो ये सोच कर नहीं की थी की उन्हें पता था की, बस वो शुरुआत करेंगे और लोग उनके साथ होते जायेंगे,बल्कि शायद उन के दिमाग में ये बात होगी की जुल्म सहना भी जुल्म का साथ देना होता है, शायद मिस्र में भी यही हुआ था वहाँ लोग सत्ताधारी होसने मुबारक की ज्याद्त्तियों से तंग आ गए थे, सत्ता परिवर्तन चाहते थे,वही हुआ जो अवाम ने चाहा, आवाम अगर एक हो जाये तो हुक्मरान को झुकना ही पढता है...मिस्र में सरकार तानाशाही थी जब की हमारे यहाँ लोकतंत्र, हमारे द्वारा चुने जाने वाले नेता ये भूल जाते हैं की उनका असल काम क्या है और बस कुर्सी पर बैठते ही भरष्टता का पाठ पढ़ना शुरू कर देते हैं...लेकिन कभी ये सोचा किसी ने की इनको भ्रष्ट कौन बनाता है? कौन है जिम्मेदार? भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी लोकपाल बिल लाने की मांग को लेकर अन्ना ने ५ अप्रैल को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन शुरू किया था, और केवल ९८ घंटों में सरकार ने अधिसूचना भी जारी कर दी,अन्ना की सारी मांगों को मान लिया गया,इस से ये तो बात साफ़ हो गयी की हमारे यहाँ वाकई लोकतंत्र की सरकार है,ये बात अलग है की सरकार में शामिल कुछ भ्रष्ट नेताओं ने सरकार की छवि को धूमिल कर दिया है,आज हम दूसरे देशों की तारीफ करते हैं वहाँ की हर चीज़ हमें अच्छी लगती है,वहाँ का रहन सहन, खाना, पहनावा, और सबसे ज्यादा सिक्यूरिटी ..हमरे देश में क्या कमी है..१२२ करोड की जनसंख्या वाला देश है हमारा चाहें तो विश्व का नक्शा बदल सकते हैं...ब्रेन की कमी नहीं, मेहनतकशों की कमी नहीं, प्राक्रतिक संसाधनों की कमी नहीं,लेकिन कमी है तो खुद में सुधर की जिस के लिए किसी को सड़कों पर उतरने की ज़रूरत नहीं, किसी अनशन की ज़रूरत नहीं बस अपने ज़मीर को सवारने की ज़रूरत है...

हर वो हिन्दुतानी जो अपनी रोज की कमाई २५% से ३०% की करता है..ज़रूरत के हिसाब से सिर्फ ५% कम करले..जिससे उसको भी नुक्सान न हो और उसके दूसरे हिन्दुस्तानी भाई पर बोझ भी न पड़े...हर भारतवासी अगर अपने काम को सच्चाई और इमानदारी से करे तो हमें किसी दूसरे की ज़रूरत नहीं ,ऐसे कई उदहारण हैं जिन्हें लिखना संभव नहीं लेकिन हर भारतवासी खूब जनता है...की हर दिल में एक नहीं अन्ना हज़ार हैं सिर्फ उसे जगाने की ज़रूरत है... जय हिंद !!!

Tuesday, April 5, 2011

क्या में सिर्फ नाम की माँ हूँ ?


ये बात मुझे बहुत परेशान कर रही है की आखिर इस देश को हुआ क्या है..जिस देश में गाय को माँ कहा जाता हो उसकी पूजा की जाती हो ,उसके मूत्र को पवित्र मान कर उसका सेवन किया जाता हो जब वो गोऊ माँ खुद बीमार हो तो उसकी देखभाल तो दूर उसे हिकारत की नज़र से देखा जाता है और पत्थर मार कर इस लिए घर से दूर कर दिया जाता है कहीं वो उनका बगीचा नहीं खराब कर दे..अभी दो दिन पहले की ही बात बात है मेरी पोश कहे जाने वाली कॉलोनी में एक नामी स्कूल के सामने जहाँ कचरा पेटी रखी है वहाँ अक्सर गायों का झुण्ड लगा रहता है क्यूंकि गायों के मालिकों को उनका घर पर पालना महंगा पढता है,उन्हें तो सिर्फ उसके दूध से मतलब होता है, और गायों को खिला कर पुण्य कमाने वालों के लिए भी ये कचरा पेटी अच्छी जगह बन गयी है..उसी कचरा पेटी के पास दो दिन पहले मैंने दो गायों के बच्चों को देखा जिनमें एक मुझे कुछ कमज़ोर नज़र आया ,बड़ा ही सुस्त, मुझे देख कर ही समझ आ गया की ये बीमार है.. मैंने सबसे पहले गाय के मालिक को इसकी सुचना दी..लेकिन उसने सुन कर अनसुना कर दिया,नतीजा जब मैंने अगले दिन सुबह देखा तो गाय का वो बच्चा मर चूका था,मुझे बहुत अफ़सोस हुआ की काश मैं कुछ और कर सकता तो शायद वो बच जाता...लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई..मैंने ये सोच कर की मामला गोऊ माता का है इसकी सुचना सबसे पहले कॉलोनी में हाल ही में बने मंदिर के पुजारी और उनके साथ बेठे भक्तजन को दी..तो उनका कहना था आप नगर निगम को बता दो हम क्या कर सकते हैं..क्यूंकि वो वक्त मेरे नमाज़ का था मुझे देर हो रही थी मैंने पंडितजी से फिर अनुग्रह किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ,जब मैं नमाज़ पढ़ कर वापस घर लौटा तो,गाय माँ को देखकर नाक पर ऊँगली रख कर गुजरने वालो की तादाद तो मुझे बहुत दिखी पर कुछ करने वाला कोई नहीं,मैंने कॉलोनी के सेक्रेट्री को फोन किया तो उनकी धर्म पत्नी ने कहा ये नगर निगम नहीं है उनको भी घर के बहुत काम हैं आप ही देखलो क्या करना है..थक हार कर मैंने भी वही किया जो सभी कह रहे थे, मैंने नगर निगम फोन लगाया जिस सज्जन ने फ़ोन उठाया बड़ी ही विनर्मता से मुझसे बात की और कहा हमने गाड़ी भेज दी है जल्दी ही उठा लिया जायेगा...लेकिन १८ घंटे बीतने क बाद भी जब कोई कारवाई नहीं हुई तो मैंने स्थानीय पार्षद को फोन किया, मुझे कुछ उम्मीद नज़र तो आयी लेकिन वो भी बेकार गयी...मैंने सोचा अब तो गोऊ रक्षा समिति ही कुछ कर सकती है...लेकिन वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी...लेकिन इनसब के बीच एक चीज़ है जिसने मेरी आखों को नम कर दिया..इस मृत गोऊ माँ के बच्चे का दूसरा साथी बच्चा, जिस को शायद अपने साथी की मौत का सब से ज्यादा दुःख हुआ है..वो लगातार उस बच्चे को दुलार रहा है...आवारा कुत्तों से उसकी हिफाज़त कर रहा है..भूखा इतना है की मैंने जब उसे रोटी खिलायी मैंने उसकी आंखों में भी आंसू देखे ,जब पानी पिलाया तो वो एक बार में ही पूरी बाल्टी पानी पी गया, मेरी तरफ ऐसी निगाहों से देख रहा था मानो कोई शिकायत कर रहा हो, क्या ये वही देश है जहाँ मुझे माँ कहा जाता है, मेरी पूजा की जाती है, या ऐसा तो नहीं की मेरे नाम पर राजनीती की रोटी सेकी जाती है ?..