
ये बात मुझे बहुत परेशान कर रही है की आखिर इस देश को हुआ क्या है..जिस देश में गाय को माँ कहा जाता हो उसकी पूजा की जाती हो ,उसके मूत्र को पवित्र मान कर उसका सेवन किया जाता हो जब वो गोऊ माँ खुद बीमार हो तो उसकी देखभाल तो दूर उसे हिकारत की नज़र से देखा जाता है और पत्थर मार कर इस लिए घर से दूर कर दिया जाता है कहीं वो उनका बगीचा नहीं खराब कर दे..अभी दो दिन पहले की ही बात बात है मेरी पोश कहे जाने वाली कॉलोनी में एक नामी स्कूल के सामने जहाँ कचरा पेटी रखी है वहाँ अक्सर गायों का झुण्ड लगा रहता है क्यूंकि गायों के मालिकों को उनका घर पर पालना महंगा पढता है,उन्हें तो सिर्फ उसके दूध से मतलब होता है, और गायों को खिला कर पुण्य कमाने वालों के लिए भी ये कचरा पेटी अच्छी जगह बन गयी है..उसी कचरा पेटी के पास दो दिन पहले मैंने दो गायों के बच्चों को देखा जिनमें एक मुझे कुछ कमज़ोर नज़र आया ,बड़ा ही सुस्त, मुझे देख कर ही समझ आ गया की ये बीमार है.. मैंने सबसे पहले गाय के मालिक को इसकी सुचना दी..लेकिन उसने सुन कर अनसुना कर दिया,नतीजा जब मैंने अगले दिन सुबह देखा तो गाय का वो बच्चा मर चूका था,मुझे बहुत अफ़सोस हुआ की काश मैं कुछ और कर सकता तो शायद वो बच जाता...लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई..मैंने ये सोच कर की मामला गोऊ माता का है इसकी सुचना सबसे पहले कॉलोनी में हाल ही में बने मंदिर के पुजारी और उनके साथ बेठे भक्तजन को दी..तो उनका कहना था आप नगर निगम को बता दो हम क्या कर सकते हैं..क्यूंकि वो वक्त मेरे नमाज़ का था मुझे देर हो रही थी मैंने पंडितजी से फिर अनुग्रह किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ,जब मैं नमाज़ पढ़ कर वापस घर लौटा तो,गाय माँ को देखकर नाक पर ऊँगली रख कर गुजरने वालो की तादाद तो मुझे बहुत दिखी पर कुछ करने वाला कोई नहीं,मैंने कॉलोनी के सेक्रेट्री को फोन किया तो उनकी धर्म पत्नी ने कहा ये नगर निगम नहीं है उनको भी घर के बहुत काम हैं आप ही देखलो क्या करना है..थक हार कर मैंने भी वही किया जो सभी कह रहे थे, मैंने नगर निगम फोन लगाया जिस सज्जन ने फ़ोन उठाया बड़ी ही विनर्मता से मुझसे बात की और कहा हमने गाड़ी भेज दी है जल्दी ही उठा लिया जायेगा...लेकिन १८ घंटे बीतने क बाद भी जब कोई कारवाई नहीं हुई तो मैंने स्थानीय पार्षद को फोन किया, मुझे कुछ उम्मीद नज़र तो आयी लेकिन वो भी बेकार गयी...मैंने सोचा अब तो गोऊ रक्षा समिति ही कुछ कर सकती है...लेकिन वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी...लेकिन इनसब के बीच एक चीज़ है जिसने मेरी आखों को नम कर दिया..इस मृत गोऊ माँ के बच्चे का दूसरा साथी बच्चा, जिस को शायद अपने साथी की मौत का सब से ज्यादा दुःख हुआ है..वो लगातार उस बच्चे को दुलार रहा है...आवारा कुत्तों से उसकी हिफाज़त कर रहा है..भूखा इतना है की मैंने जब उसे रोटी खिलायी मैंने उसकी आंखों में भी आंसू देखे ,जब पानी पिलाया तो वो एक बार में ही पूरी बाल्टी पानी पी गया, मेरी तरफ ऐसी निगाहों से देख रहा था मानो कोई शिकायत कर रहा हो, क्या ये वही देश है जहाँ मुझे माँ कहा जाता है, मेरी पूजा की जाती है, या ऐसा तो नहीं की मेरे नाम पर राजनीती की रोटी सेकी जाती है ?..
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